उत्तराखण्ड में विपक्ष ने लगाया आरोप- ढ़ाई साल का सफर, हासिल सीफर

Spread the love

कौमी गुलदस्ता ब्यूरोः उत्तराखंड  में अब तक के सबसे प्रचंड बहुमत वाली त्रिवेंद्र रावत सरकार ढाई साल के अपने कार्यकाल को सफल बताते हुए अपनी उपलब्धियां तो गिना रही है लेकिन विपक्ष को नहीं लगता कि इस सरकार ने कोई शाबासी का काम किया है. उत्तराखंड कांग्रेस प्रवक्ता गरिमा दसौनी तो सरकार को हर मोर्चे पर फेल बताती हैं और कहती हैं कि इस सरकार ने जनता के विश्वास के साथ छल किया है. दसौनी बिंदुवार सरकार की नाकामियां गिनाती हैं और कहती हैं कि इस सरकार के पास कोई विज़न ही नहीं है. त्रिवेंद्र सरकार के ढाई साल पर कांग्रेस प्रवक्ता की बात, उन्हीं के शब्दों में…

कोई विज़न नहीं, शराब बेचने पर फ़ोकस

त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार जिस प्रचंड बहुमत से प्रदेश की सत्ता पर काबिज हुई, उससे जन-अपेक्षाएं बढ़ना स्वाभाविक था लेकिन यह सरकार इन्हें पूरा करने में बुरी तरह नाकाम रही. इस सरकार की सबसे बड़ी असफलता यह है कि उनके पास राज्य को लेकर अपना कोई विज़न नहीं है, उनका ज्यादा फ़ोकस मोदी के कार्यक्रमों पर ही रहता है.

भाजपा ने 2017 में शराब को चुनावी मुद्दा बनाया था, लेकिन त्रिवेंद्र सरकार ने न सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के हाईवे पर लिकर सेल पर बैन के ऑर्डर में छूट की मांग को लेकर विशेष याचिका दायर की बल्कि शराब की दुकानें खोलने के लिए राज्य राजमार्गों को ज़िला मार्ग में भी बदल दिया. पूर्ववर्ती सरकार के मुकाबले न सिर्फ 120 से ज़्यादा शराब की दुकानें खुलवाईं वरन राज्य गठन के बाद पहली बार शराब की होम डिलीवरी की गई. पिछले दिनों देवप्रयाग में व्हिस्की प्लांट की स्थापना से सरकार का असली चेहरा जनता के सामने बेनकाब हो गया.

किसान और स्वास्थ्य की दुर्दशा

त्रिवेंद्र सरकार केंद्र की तर्ज पर किसानों की आमदनी दुगनी करने का राग अलापती है,, लेकिन इसकी हकीकत बताने को यह जानकारी काफ़ी है कि राज्य गठन के बाद पहली बार 13 किसानों की आत्महत्या के मामले सामने आए.

खुद मुख्यमंत्री स्वास्थ विभाग का जिम्मा संभाल रहे हैं, लेकिन व्यवस्था की स्थिति यह है कि PHC और CSC तो छोड़िए टिहरी का ज़िला अस्पताल तक PPP मोड में दे दिया गया है. इससे यह साफ़ हो जाता है कि त्रिवेंद्र सिंह रावत ने मान लिया है कि अस्पतालों का संचालन उनके बस की बात नहीं है.

बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार के आगे असहाय

त्रिवेंद्र सरकार पलायन आयोग गठित करके आत्ममुग्ध नजर आ रही थी, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि राज्य गठन के बाद आज बेरोज़गारी की दर सबसे ज्यादा है. उत्तराखंड की आर्थिक स्थिति इस कदर खराब है कि नॉन प्लान खर्चों के लिए अमूमन हर महीने ऋण लेना पड़ रहा है.

कन्फ़्यूज़न का आलम यह है कि त्रिवेंद्र सरकार ने पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में जारी हुए खनन के पट्टे निरस्त कर दिए और फिर कुछ महीनों बाद ही सारे पट्टे बहाल कर दिए. इससे उत्तराखंड में अवैध खनन बढ़ा और उप खनिजों के दाम बहुत ज्यादा बढ़ गए.

जिस तरह बीजेपी ने अपने घोषणापत्र में भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए 100 दिन के अंदर लोकायुक्त देने का वादा करके उसको ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है उससे ‘भ्रष्टाचार पर ज़ीरो टॉलरेंस’ का नारा भी जुमला ही साबित हुआ है. एनएच 74 में भी सीबीआई जांच की बात कहकर मुख्यमंत्री बैकफुट पर नजर आए हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *